top of page

51%/49% - वेदांता बनाम सरकार

  • Media Samvad Editor
  • Nov 6
  • 3 min read
ree

साल 2001 में सरकार ने बाल्को (BALCO) की 51 फीसदी हिस्सेदारी वेदांता (तब स्टरलाइट) को बेच दी थी। कहा गया था — “भारत का पहला स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप मॉडल।”

शेयर होल्डर समझौता

तत्कालीन सरकार एवं स्टरलाइट कंपनी के मध्य एक शेयर-होल्डर समझौता निष्पादित किया गया। जिस पर माननीय राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में खान मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षर किया गया ।

सरकार और वेदांता के बीच जो शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट (SHA) हुआ था, उसमें एक खास धारा थी – 3 साल बाद वेदांता को सरकार के बचे 49 फीसदी शेयर खरीदने का विशेष अधिकार (“कॉल ऑप्शन”) मिलेगा।यानी तीन साल में बाल्को पूरी तरह वेदांता की हो जाती।

सरल भाषा में यह ऐसा था मानो सरकार ने वेदांता को कहा हो — “तीन साल बाद ये कंपनी पूरी तुम्हारी होगी।

49% सरकारी हिस्सेदारी का भुगतान

तीन वर्ष बाद स्टारलाइट प्रबंधन नें , शेयरहोल्डर समझौते की इन शर्तों का उपयोग करते हुए, भारत सरकार को, बकाया 49% शेयर,  को कॉल ऑप्शन के तहत हस्तांतरित करने के लिए, नोटिस जारी किया और वृहद संवाद के बाद , स्टरलाइट(अब वेदांता) प्रबंधन द्वारा दिनांक 30 मार्च 2006 को एक पत्र प्रेषित किया गया, जिसमें अन्य बातों के साथ यह उल्लेख किया गया था कि —

“आपके अनुरोधानुसार दिनांक 31 मार्च 2006 तक लेन-देन पूर्ण करने के हित में तथा बाल्को और उसके कर्मचारियों के हित में, हम यह प्रस्ताव रखते हैं कि आपके द्वारा गणना किए अनुसार प्रत्येक ‘कॉल्ड शेयर्स’ का मूल्य रुपये 101.65 पैसे प्रति शेयर की दर से, बिना किसी पूर्वाग्रह (without prejudice) और पंचाट (arbitration) द्वारा अंतिम निर्णय के अधीन रहते हुए, भुगतान किया जाए, और उक्त भुगतान के बदले वे ‘कॉल्ड शेयर्स’ हमारे नाम स्थानांतरित कर दिए जाएँ।”

उक्त पत्र के साथ आईसीआई बैंक (ICICI Bank) पर आहरित दिनांक 30 मार्च 2006 का एक चेक संलग्न किया गया था, जिसकी राशि थी ₹1,098,89,75,408.20 (रुपये एक हज़ार अट्ठानबे करोड़, उन्यासी लाख, पचहत्तर हज़ार चार सौ आठ रुपये और बीस पैसे मात्र)।

माननीय उच्च न्यायालय दिल्ली के आदेश ,पृष्ठ क्रमांक 72 में लेख्य :The Claimant addressed a letter dated March 30, 2006 stating inter alia "in the interest of completing the transaction by March 31, 2006 as requested by you and in the interest of Balco and its employees, we propose that we make payment of the Called Shares Rs.101.65 ps per share as calculated by you, without prejudice and subject to final determination by arbitration and the Called Shares are transferred to us against the said payment". A cheque dated March 30, 2006 drawn on ICICI Bank in a sum of Rs.1098,89,75,408.20 ps was sent along with the said letter.

विवाद की उत्पत्ति

सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, और इस तरह स्टरलाइट ( अब वेदांता ) एवं भारत सरकार के मध्य एक विवाद ने जन्म लिया।  और अंततः यह विवाद आर्बिट्रैशन ( मध्यस्तता एवं पंच-निर्णय ) हेतु विवाचक अधिकरण (Arbitration Tribunal) की ओर संप्रेषित किया गया ।

आर्बिट्रल ट्राइब्यूनल का निर्णय

2011 में बने आर्बिट्रल ट्राइब्यूनल — जिसमें तीन पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज शामिल थे — ने माना कि SHA की यह शर्त कानून के खिलाफ है।ट्राइब्यूनल ने कहा —

“सरकार को केवल याचिकाकर्ता (वेदांता) को शेयर बेचने पर मजबूर किया जा रहा था, जो कंपनी एक्ट की धारा 111A(2) के विपरीत है।”(“The Government was being forced to sell … only to the Petitioner … clearly in contravention with Section 111A(2).”)

दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला

वेदांता ने इस अवार्ड को चुनौती दी, लेकिन न्यायालय ने अक्टूबर 8, 2025 के अपने निर्णय में साफ कहा —

  1. कानून सर्वोपरि है — राष्ट्रपति की स्वीकृति या सरकारी अनुबंध भी कंपनी कानून को नहीं बदल सकते।

  2. मुक्त अंतरणीयता ही सार्वजनिक कंपनी का चरित्र है —

“यह सार्वजनिक कंपनी का मूल चरित्र है, जिसे केवल कानून द्वारा ही सीमित किया जा सकता है।”

  1. ट्राइब्यूनल का फैसला तर्कसंगत और ‘plausible view’ है, इसलिए अदालत को हस्तक्षेप की जरूरत नहीं।

जनता के नजरिये से इसका मतलब

यह फैसला सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि जनता की पूंजी और अधिकारों की भी जीत है।अब कोई भी कंपनी यह नहीं कह सकेगी कि “सरकारी समझौते” के दम पर वह कानून से ऊपर है।यह फैसला सरकार और उद्योगों के बीच की “सीमा-रेखा” फिर से खींच देता है —कि साझेदारी (Partnership) का मतलब “मालिकाना हक” नहीं होता।

निष्कर्ष

इस पूरे विवाद ने दो बातें साफ कर दीं —

  1. कानून की किताब में कोई कॉर्पोरेट अपवाद नहीं लिखा है।

  2. भारत में सार्वजनिक संपत्ति पर निजी नियंत्रण की सीमा तय है।


वेदांता का “कॉल-ऑप्शन” अब “नल-ऑप्शन” बन चुका है।कानून ने दिखा दिया कि —

“डिसइन्वेस्टमेंट का मतलब देश का डिसओनरशिप नहीं होता।”

 
 
 

Comments


Subscribe to Our Newsletter

Thanks for submitting!

  • White Facebook Icon

© 2035 by Media Samvad. Powered and secured by Wix

मीडिया संवाद पत्रिका  
वेब पोर्टल 

​संचालक:राधेश्याम चौरसिया 

​RNI No. CHHHIN/2011/43442

bottom of page