रणनीतिक साझेदार की रणनीति – आधुनिक उपनिवेशवाद का एक षड्यंत्रात्मक दस्तावेज़
- Media Samvad Editor
- Aug 4, 2025
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भारतीय नौकरशाही का ऐतिहासिक मील का पत्थर
मार्च 2, 2001 को भारत सरकार द्वारा किया गया एक समझौता, भारत के औद्योगिक विकास के इतिहास में मोड़ साबित हुआ। यह घटना अब इतिहास के पन्नों में एक गहन शोध का विषय बन चुकी है — शोधार्थियों के लिए एक नया रिसर्च टॉपिक प्रस्तुत है।
सार्वजनिक उपक्रमों का काला दिन
ब्लैक डे, जैसा कि औद्योगिक ट्रेड यूनियन नेताओं व कर्मचारियों द्वारा कहा जाता है, वही दिन था जब भारत सरकार ने भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (BALCO) के प्रबंधन का हस्तांतरण स्टरलाइट इंडस्ट्रीज को सौंपने का समझौता किया।
BALCO – राष्ट्र का गौरव
एक लाभकारी सार्वजनिक उपक्रम BALCO हर वर्ष लगभग ₹5 करोड़ का लाभांश भारत सरकार को दे रहा था। इस राष्ट्र के गौरव को "रणनीतिक" तरीके से उस व्यापारी समूह को सौंप दिया गया, जिस पर SEBI द्वारा शेयर बाजार में गड़बड़ी के आरोप थे।
सरकार द्वारा उद्धृत रणनीतिक कारण
रणनीतिक साझेदार जैसा शब्द उस भ्रष्ट निर्णय को वैधानिक बनाने के लिए प्रयुक्त किया गया जिसे वास्तव में एक आर्थिक घोटाला कहा जाना चाहिए।
विनिवेश मंत्रालय के सचिव द्वारा उद्धृत बयान:“यह एक लाभकारी कंपनी थी, जिससे ₹5.69 करोड़ का औसत लाभांश मिलता था। हमने ₹826 करोड़ में हिस्सेदारी बेची, और 10% ब्याज पर ऋण लेने की स्थिति में हम हर साल ₹82.65 करोड़ कमाएंगे।”
मिलीभगत और सुविधा की रणनीति
उपरोक्त तथ्य तो मात्र एक झलक हैं उस भयानक षड्यंत्र की, जिसमें सार्वजनिक संसाधनों की खुली लूट को 'नीति' बताया गया। सौभाग्य है कि यही सचिव भारत-चीन सीमा विवाद सुलझाने नहीं भेजे गए, नहीं तो "गैर-आय अर्जित करने वाली भूमि" कहकर पता नहीं कौन-कौन सी ज़मीनें भी बेच दी जातीं।
स्पष्ट प्रश्न
1. क्या वित्त पर स्थायी समिति द्वारा की गई टिप्पणियाँ और सिफारिशें स्वीकार की गईं? क्या कोई सुधारात्मक कार्यवाही हुई?
2. क्या यह एकमात्र ऐसा तथ्य था, जिसे समिति ने मानने से इंकार किया
मंत्रालय द्वारा दिए गए जवाबों पर वित्त समिति की टिप्पणी
जब सचिव महोदय से पूछा गया कि BALCO की खदानों का अनुमानित मूल्य एक बिलियन डॉलर से अधिक था, उन्होंने मौखिक रूप में कहा:“एक कंपनी के पास बड़े संपत्ति हो सकते हैं, लेकिन वे संपत्ति आय नहीं दे रहीं।”(स्रोत: तीसरी रिपोर्ट – वित्त पर स्थायी समिति, 2002)
समिति की तीखी प्रतिक्रिया:
संपत्ति मूल्यांकन के दिशा-निर्देश अधूरे और अस्पष्ट हैं, विशेषकर भूमि के संबंध में। समिति इस विचार से सहमत नहीं कि जो संपत्ति आय नहीं दे रही, उसकी कोई मूल्य नहीं है। भूमि एक मूर्त संपत्ति है जिसका मूल्य सदा होता है — भले ही वह तुरंत आय न दे रही हो। ऐसी संपत्तियों को अलग से मूल्यांकित किया जाना चाहिए और समग्र मूल्य में जोड़ा जाना चाहिए।
अंतिम प्रश्न
3. क्या विनिवेश मंत्रालय के सचिव ₹82.65 करोड़ वार्षिक आय सुनिश्चित कर पाए?
निष्कर्ष
बने रहिए — जल्द ही हम इन सवालों के तथ्यात्मक उत्तर उजागर करेंगे, और उस भयंकर षड्यंत्र का परदाफाश करेंगे, जिसे रणनीति का नाम देकर आधुनिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया गया।



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