रणनीतिक साझेदार की रणनीति – f(कल्याण) = विदाई
- Media Samvad Editor
- Aug 7, 2025
- 3 min read

जब ‘कर्मचारी कल्याण’ को सरकार ने ही मृत घोषित कर दिया
प्रस्तावना
पिछले लेख “रणनीतिक साझेदार की रणनीति – मैच फिक्सिंग” की कड़ी में, ये नया लेख कुछ और गहरे राज़ खोलता है — ऐसा षड्यंत्र, जो आज़ादी के बाद फिर से औपनिवेशिक युग को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है — इस बार सूट-बूट और भ्रष्टाचार के सहारे।
संक्षिप्त पुनरावलोकन – पिछली साजिश की रील
आइए अब तक के मुख्य तथ्यों को दोहराते हैं:
सचिव, DIPAM का बयान:“BALCO की ज़मीन से कोई आमदनी नहीं हो रही थी, इसलिए उसकी कोई वैल्यू नहीं थी।”
वित्त समिति का उत्तर: “भूमि एक मूर्त संपत्ति है; उसकी हमेशा एक कीमत होती है।”
दूसरा बयान:“BALCO से हमें ₹5.69 करोड़ प्रतिवर्ष लाभांश मिल रहा था, पर हमने इसे ₹826 करोड़ में बेच दिया। अब हमें ₹82.60 करोड़ मिलेंगे।”
असलियत:मीडिया रिपोर्ट में सामने आया कि BALCO की बिक्री ₹551.50 करोड़ में हुई थी।➤ तो बाकी ₹274.50 करोड़ कहाँ गए?शायद किसी गुप्त तिजोरी में रखे हैं जिस पर लिखा है: “मैं ट्रेड सीक्रेट हूँ – मुझे मत छेड़ो!”
RTI से पूछी गई जानकारी — सब खारिज कर दी गई। कारण? “ट्रेड सीक्रेट है।”
सचिव, DIPAM का बचाव:“बोलीदाताओं की पात्रता के दिशा-निर्देश जुलाई 2001 में बनाए गए।”लेकिन BALCO मार्च 2001 में ही बिक चुका था!
➤ अनुवाद:“डकैती मार्च में हो गई... पर चिंता मत कीजिए — CCTV कैमरा जुलाई में लगा दिया गया।”
उस समय Sterlite के चेयरमैन और CFO पर SEBI द्वारा जांच चल रही थी, फिर भी DIPAM के अफसर ‘एयरप्लेन मोड नैतिकता’ पर कायम रहे।
जब वित्त समिति चेतावनी दे तो वो इशारा नहीं, अलार्म होता है!
वित्त समिति ने जब BALCO के कर्मचारियों के भविष्य को लेकर सवाल किया:
सचिव, DIPAM बोले:
“BALCO में लगभग 400 लोगों ने VRS के लिए आवेदन किया है।”
वित्त समिति की प्रतिक्रिया:
“एक PSU के 80% कर्मचारियों ने VRS के लिए आवेदन किया है, जबकि सरकार दावा करती है कि कर्मचारी हित सुरक्षित हैं।ऐसा प्रतीत होता है कि नई मैनेजमेंट ने जानबूझकर ऐसी स्थितियाँ बनाई जिससे कर्मचारियों को VRS के अलावा कोई विकल्प न बचे। नए प्रबंधन द्वारा जानबूझ-कर उन्हें दूर-दराज़ स्थानों पर ट्रांसफर कर प्रतड़ित किया जा रहा है । समिति की राय में, यह VRS नहीं, बल्कि FRS (Forced Retirement Scheme) है — और सरकार मूक दर्शक बनी रही।”(स्रोत: 30वीं रिपोर्ट, वित्त पर स्थायी समिति, 2002)
f(कल्याण) = विदाई: तब और अब का अंतर
वर्ष 2002 | वर्ष 2025 |
दूर-दराज ट्रांसफर = शोषण का ज़रिया | अब ट्रांसफर = “बिजनेस की ज़रूरत और नियोक्ता का अधिकार” |
मजबूरी में लिया गया VRS = FRS (Forced Retirement Scheme) | अब सीधे FTS (Forced Termination Scheme) — न सहमति, न विकल्प, सिर्फ बर्खास्तगी |
सरकार = मूकदर्शक | सरकार = पूर्ण भागीदार कर्मचारियों को बोला जाता है: “यह नौकरी की शर्तें हैं, न्याय के लिए कोर्ट जाइए।” (लेकिन याद रखिए — न्याय, 2G स्पीड से आता है) |
जमीनी हकीकत:
वित्त समिति ने 2002 में जो टिप्पणियाँ दी थीं — वो सिर्फ आलोचना नहीं थीं, वो भविष्य का खतरे का संकेत थीं।पर उन चेतावनियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया।आज, नए युग के औपनिवेशिक एजेंट ही व्यवस्था चला रहे हैं।और संविधान के रक्षक — उन्हीं एजेंटों के लिए सुविधाएं जुटा रहे हैं।
सबसे दुखद बात:
जनता, जिसे लोकतंत्र का आधार कहा जाता है, अब इसे अपने भाग्य की तरह स्वीकार कर चुकी है।
जुड़े रहिए !
अगले भाग में :“₹82.60 करोड़ की वार्षिक आय का रहस्य — DIPAM का गणित बनाम जमीनी हकीकत”



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